यह बात बीते कई महीनों से साफ है कि माओवादी उग्रवाद के तेवर ढीले पड़ते जा रहे हैं। माओवादियों की मौजूदगी 11 जिलों तक सिमट गई है तथा इसके मुख्य इलाके घटकर तीन ही रह गए हैं – छत्तीसगढ़ के जंगली और सुदूरवर्ती जिले बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा। जिसे कभी देश की “आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा” कहा जाता था, उसे कमजोर करने का श्रेय जमीनी हकीकत के मुताबिक आतंकवाद विरोधी रणनीति अपनाने वाले सुरक्षा बलों तथा जिला प्रशासन और 2000 के दशक के मध्य से आने वाली सरकारों को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने विकास कार्यों में तेजी लाई। मध्य भारत के अब तक गरीब आदिवासी इलाकों में माओवादियों की हार संयुक्त आंध्र प्रदेश में पांव उखड़ने की तर्ज पर ही हुई, जहां इसी किस्म की रणनीति अपनाई गई थी। इससे विद्रोहियों के लिए शहरों के चारों ओर घेरा डाल कर वैकल्पिक शासन की संरचनाएं बनाना लगभग नामुमकिन हो गया। यह एक ऐसी योजना थी, जिसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने एक सदी पहले राष्ट्रवादियों को हराने के लिए अपनाया था। माओवादियों का लक्ष्य मध्य व उत्तर-मध्य भारत के दूरदराज के जिलों, झारखंड, छत्तीसगढ़, पूर्वी महाराष्ट्र, पश्चिमी ओडिशा और उत्तरी आंध्र प्रदेश में अपना आधार क्षेत्र बनाना था। उन्हें आदिवासियों से समर्थन की उम्मीद थी, जिनमें से कई राज्य और उसके विकासात्मक अंगों की गैरमौजूदगी के चलते असंतोष से ग्रस्त थे।
दक्षिण छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और ओडिशा के कुछ हिस्सों ने भले ही शुरुआत में माओवादियों को वैकल्पिक संस्थाएं स्थापित करने के लिए परिस्थितियां प्रदान कीं, लेकिन वक्त के साथ आदिवासियों की व्याकुलता बढ़ती गई और उनमें भारतीय राज्य के खिलाफ सैन्यवादी लड़ाई में मोहरे के रूप में इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ नाराजगी बढ़ी। इसकी आंशिक वजह यह थी कि माओवादियों ने आदिवासियों के आर्थिक उत्थान की अपेक्षा सशस्त्र संघर्ष को तरजीह दी। 2000 के दशक के अंत में माओवादियों को उस वक्त ताकत मिली जब सलवा जुडूम अभियान के चलते बड़े पैमाने पर विस्थापन व क्रूर आंतरिक लड़ाई हुई, जिससे खफा होकर लोग उनके संगठन में भर्ती हुए। हालांकि, इस अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध और उग्रवाद-विरोधी बलों के पेशेवर रूख ने उग्रवादियों के विद्रोह को कमजोर कर दिया। इसके साथ ही, आदिवासी लोगों को सक्रिय राज्य से – निरंतर सीमाओं के बावजूद – अधिक लाभ दिखाई देने लगे जिसके चलते एक वैकल्पिक राज्य के लिए हिंसक रास्ता अख्तियार करने के माओवादी विचार से उनका मोहभंग होने लगा। यह अनुभव पेरू, कोलंबिया,
