इस दीवाली पर दिल्ली में कानूनी अनुमति के तहत पटाखे फोड़े जा रहे हैं। पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में साल 2018 से अपने द्वारा लागू प्रतिबंध को संशोधित किया और त्योहार के दौरान हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति दी। यह निर्णय क्रियान्वयन को लेकर कुछ शर्तों के साथ आया है, लेकिन यह उस सतत चुनौती को रेखांकित करता है जिसका सामना प्राधिकारियों को लोक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता देते समय सांस्कृतिक मानदंडों और आर्थिक गतिविधियों के दबावों से निपटने में करना पड़ता है। कानूनी अनुमति-प्राप्त, कम-प्रदूषक विकल्पों को दोबारा लाया जाना भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद सरकारी नीति में बदलाव की निशानी है और इसका मकसद दिल्ली में परंपरागत आतिशबाजी के गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव (जिस पर जाड़े की जहरीली हवा का कुछ ज्यादा ही असर पड़ता है) को स्वीकार करने के साथ पारंपरिक उत्सवों के लिए गुंजाइश बनाना है। यह कदम इस बात को मान्यता देता है कि आतिशबाजी का इस्तेमाल दीपोत्सव के दौरान आनंद की एक अभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। इसके अलावा, पटाखा उद्योग लाखों लोगों की रोजी-रोटी में मदद करता है, जिससे आर्थिक पहलू भी नियामक परिदृश्य का हिस्सा बन जाते हैं।

इस दीवाली पर दिल्ली में कानूनी अनुमति के तहत पटाखे फोड़े जा रहे हैं। पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में साल 2018 से अपने द्वारा लागू प्रतिबंध को संशोधित किया और त्योहार के दौरान हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति दी। यह निर्णय क्रियान्वयन को लेकर कुछ शर्तों के साथ आया है, लेकिन यह उस सतत चुनौती को रेखांकित करता है जिसका सामना प्राधिकारियों को लोक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता देते समय सांस्कृतिक मानदंडों और आर्थिक गतिविधियों के दबावों से निपटने में करना पड़ता है। कानूनी अनुमति-प्राप्त, कम-प्रदूषक विकल्पों को दोबारा लाया जाना भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद सरकारी नीति में बदलाव की निशानी है और इसका मकसद दिल्ली में परंपरागत आतिशबाजी के गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव (जिस पर जाड़े की जहरीली हवा का कुछ ज्यादा ही असर पड़ता है) को स्वीकार करने के साथ पारंपरिक उत्सवों के लिए गुंजाइश बनाना है। यह कदम इस बात को मान्यता देता है कि आतिशबाजी का इस्तेमाल दीपोत्सव के दौरान आनंद की एक अभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। इसके अलावा, पटाखा उद्योग लाखों लोगों की रोजी-रोटी में मदद करता है, जिससे आर्थिक पहलू भी नियामक परिदृश्य का हिस्सा बन जाते हैं
हालांकि, जैसा कि दिल्ली के वायु प्रदूषण का इतिहास दिखाता है, साफ हवा की लड़ाई मौसम विज्ञान, आर्थिक संरचना, आबादी और भूगोल की जटिल अंत:क्रिया है। कई विशेषज्ञ निकाय और कार्य बल विज्ञान और व्यापक माप-जोख (इतने बड़े पैमाने पर दुनिया के कुछ ही शहरों ने कोशिश की है) का इस्तेमाल करके इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि वायु गुणवत्ता पर विविध स्रोत असर डालते हैं, जिनमें अलग-अलग अवधि में परिवहन, उद्योग, कृषि-अपशिष्ट दहन, जैविक पदार्थ दहन, कंस्ट्रक्शन और सड़क की धूल शामिल हैं। सबूत यह भी बताते हैं कि लंबी बारिश में फासले का औसत वायु गुणवत्ता स्तर के सुधार पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। इस सालाना प्रदूषण की समस्या में पटाखों का योगदान अस्थायी भले हो, लेकिन आंकड़े तस्दीक करते हैं कि इसके परिणामस्वरूप प्रदूषण में अचानक बढ़ोतरी ने पहले से ही हवा की खराब हालत को बदतर बना दिया है। वैज्ञानिक रूप से विकसित ‘हरित’ पटाखों – जिनके लगभग दो-तिहाई कम विषाक्त होने का अनुमान है – के इस्तेमाल की इजाजत देना नियंत्रित
