
अपराध और जेल के आंकड़ों पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक रिपोर्टों को इस सख्त ताकीद के साथ पढ़ा जाना चाहिए कि ज्यादातर आंकड़ों की राज्यों के बीच तुलना नहीं हो सकती क्योंकि पहली बात यह है कि वे काफी हद तक अपराधों के पंजीकरण/रिपोर्टिंग पर निर्भर हैं। इसके बावजूद, कुछ राष्ट्रीय रुझान और राज्यों के भीतर साल-दर-साल हो रहे तेज बदलाव ऐसे अर्थपूर्ण पैटर्नों को सामने लाते हैं जिनके लिए नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत हो सकती है। एक साल देर से आयी हालिया एनसीआरबी रिपोर्ट 2023 मौजूदा केंद्र सरकार के तहत सर्वेक्षणों, रिपोर्टों और यहां तक कि जनगणना को टाले जाने के चिंताजनक रुझान की ओर इशारा करती है। जो भी हो, इस रिपोर्ट में तीन अहम चौंकानेवाले आंकड़े हैं: देश भर में हत्या के मामलों में 2.8 फीसदी की कमी; अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों में 28.8 फीसदी का हैरतअंगेज उछाल; और साइबर अपराधों में 31.2 फीसदी की बढ़ोतरी। हत्या के मामलों में कमी कानून प्रवर्तन के लिए राहत की बात होगी – इनमें ज्यादातर मामले विवादों, व्यक्तिगत बदले या रंजिश और “फायदे” से संबंधित हैं – लेकिन अन्य दो आंकड़े चिंताजनक हैं। अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ अपराधों में तेज वृद्धि मणिपुर में हिंसा के चलते है, जहां पंजीकृत मामलों की संख्या साल 2022 में महज एक से उछल कर साल 2023 में 3,399 हो गयी – जिसे ज्यादा प्रभावकारी सरकार कम कर सकती थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी आदिवासियों के खिलाफ काफी ऊंची अपराध दर दर्ज की गयी जिससे मध्य भारतीय राज्यों में उनके आसान निशाना होने का पता चलता है। यह कोई नयी परिघटना नहीं है; पूर्व की एनसीआरबी रिपोर्टों ने भी ठीकठाक आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में उच्च अपराध दरों को उजागर किया है।
अपराध और जेल के आंकड़ों पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक रिपोर्टों को इस सख्त ताकीद के साथ पढ़ा जाना चाहिए कि ज्यादातर आंकड़ों की राज्यों के बीच तुलना नहीं हो सकती क्योंकि पहली बात यह है कि वे काफी हद तक अपराधों के पंजीकरण/रिपोर्टिंग पर निर्भर हैं। इसके बावजूद, कुछ राष्ट्रीय रुझान और राज्यों के भीतर साल-दर-साल हो रहे तेज बदलाव ऐसे अर्थपूर्ण पैटर्नों को सामने लाते हैं जिनके लिए नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत हो सकती है। एक साल देर से आयी हालिया एनसीआरबी रिपोर्ट 2023 मौजूदा केंद्र सरकार के तहत सर्वेक्षणों, रिपोर्टों और यहां तक कि जनगणना को टाले जाने के चिंताजनक रुझान की ओर इशारा करती है। जो भी हो, इस रिपोर्ट में तीन अहम चौंकानेवाले आंकड़े हैं: देश भर में हत्या के मामलों में 2.8 फीसदी की कमी; अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों में 28.8 फीसदी का हैरतअंगेज उछाल; और साइबर अपराधों में 31.2 फीसदी की बढ़ोतरी। हत्या के मामलों में कमी कानून प्रवर्तन के लिए राहत की बात होगी – इनमें ज्यादातर मामले विवादों, व्यक्तिगत बदले या रंजिश और “फायदे” से संबंधित हैं – लेकिन अन्य दो आंकड़े चिंताजनक हैं। अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ अपराधों में तेज वृद्धि मणिपुर में हिंसा के चलते है, जहां पंजीकृत मामलों की संख्या साल 2022 में महज एक से उछल कर साल 2023 में 3,399 हो गयी – जिसे ज्यादा प्रभावकारी सरकार कम कर सकती थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी आदिवासियों के खिलाफ काफी ऊंची अपराध दर दर्ज की गयी जिससे मध्य भारतीय राज्यों में उनके आसान निशाना होने का पता चलता है। यह कोई नयी परिघटना नहीं है; पूर्व की एनसीआरबी रिपोर्टों ने भी ठीकठाक आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में उच्च अपराध दरों को उजागर किया है।
देश भर में इंटरनेट की पैठ बढ़ने के साथ, साइबर अपराध में इजाफा हुआ है, खासकर वित्तीय धोखाधड़ी और यौन शोषण से संबंधित। तमाम किस्सों के आधार पर, यह जगजाहिर है कि दैनिक लेनदेन और निवेश में डिजिटल वित्तीय साधनों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ पिछले दो सालों में इन संख्याओं में और बढ़ोतरी हुई होगी। साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के साथ बराबरी में आने के लिए पुलिस ने विशेष प्रकोष्ठों के जरिए कोशिश की है, लेकिन डिजिटल अपराधों की सर्वव्यापकता और गहराती विविधता के कारण उनसे निपटने के लिए पुलिस को ज्यादा कुशलता और समर्पण की जरूरत है। साल 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों में 9.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई – इनमें 96 फीसदी मामलों में गुनहगार, पीड़ित का जाननेवाला था। यह बढ़ोतरी तमाम राज्यों में बेहतर रिपोर्टिंग का नतीजा हो सकती है, लेकिन भारी संख्या (1,77,335 मामले) यह बताती है कि राज्यों को इन अपराधों और बालिगों के अनुचित व्यवहार के बारे में बच्चों को जागरूक करने के लिए युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। इन अपराधों के एक उप-समुच्चय में, आपसी रजामंदी से बने किशोरवय संबंधों के मामले में पोक्सो अधिनियम का इस्तेमाल भी शामिल हो सकता है और यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें अभियोजन और पुलिसिंग एजेंसियों को बहुत एहतियात बरतने की जरूरत है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों (जो रिपोर्ट किये गये) में 0.4 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई, लेकिन यह एक स्थायी सामाजिक समस्या की ओर इशारा करने वाले दहेज से जुड़े अपराधों में 14.9 फीसदी के उछाल को छुपाता है।
