
भारत के जहाज निर्माण और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के मकसद से हाल ही में घोषित 69,725 करोड़ रुपये का पैकेज, 2015 के पैकेज की जगह लेगा। वर्ष 2015 के पैकेज की अवधि मार्च 2026 में समाप्त होने वाली है। पिछले 10 सालों के दौरान जहां आकर्षक रक्षा ऑर्डरों ने कुछ शिपयार्डों को व्यस्त रखा, वहीं पूरे भारत में मात्र आधा दर्जन छोटे व्यापारी जहाज ही बनाए गए। बड़े व्यापारी जहाज बनाने की भारत की क्षमता अभी भी नगण्य सी है। इस नए पैकेज के तहत यह क्षमता बढ़कर 4.5 मिलियन सकल टन हो जाने की उम्मीद है। इस योजना का मकसद अत्याधुनिक तकनीक एवं प्रबंधन सिद्धांतों से लैस कर शिपयार्डों को उन्नत बनाना, जहाज निर्माण से जुड़े सहायक कारखानों वाले क्लस्टरों में नए यार्डों को बढ़ावा देना और नए निर्माणों के वित्तपोषण के लिए जहाज मालिकों को सहायता प्रदान करना है। लेकिन यह पैकेज कितना सफल होगा, इसको लेकर अहम सवाल बने हुए हैं क्योंकि पिछला पैकेज काफी हद तक विफल रहा था।दुनिया भर में, जहाज निर्माण को एक उत्कृष्ट कला के रूप में विकसित किया गया है। कोरियाई, जापानी या यहां तक कि चीनी यार्डों में, बड़े व्यापारी जहाजों के घटक ब्लॉकों को वास्तविक शुष्क गोदी के बाहर पूर्वनिर्मित किया जाता है और फिर 1,000 टन के क्रेन का इस्तेमाल करके शुष्क गोदी में ले जाया जाता है, जहां उन्हें एक साथ जोड़ दिया जाता है। ये यार्ड संयोजन वीथी (असेंबली लाइन) के लिहाज से पर्याप्त लंबे हैं। पहले, निर्माण की प्रक्रिया में कील बिछाने से लेकर पानी में चलने तक का काम शामिल होता था। आज इसमें सिर्फ तीन से चार महीने ही लगते हैं। एक बड़े व्यापारी जहाज के लिए पहले स्टील की प्रक्रिया से लेकर समुद्री परीक्षण तक, लगभग एक साल का समय लगता है। एक-दो अपवादों को छोड़कर, भारतीय यार्ड न तो पर्याप्त लंबे हैं और न ही उनमें क्रेन क्षमता, जगह और प्रीफैब की प्रक्रिया पूरी करने की क्षमता है। सहायक उपकरण एक और बाधा हैं। भारत में लगभग दो से तीन सालों का समय लगना – या फिर दो और सालों तक बिना किसी लाभ के पूंजी डूबी रहना आम बात है। यही भारतीय जहाज मालिकों द्वारा नए जहाज के निर्माण का ऑर्डर न देने की एक प्रमुख वजह है। यह एक अलग बात है कि पिछली नीति में सब्सिडी ने उच्च पूंजीगत व्यय के मुद्दे पर काफी ध्यान दिया। शिपयार्ड के उन्नयन के दौरान इस मसले के समाधान पर गौर किया जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर, चीन ने जहाज निर्माण काफी मंथन किया है तथा जनशक्ति को प्रशिक्षित करने के लिए संस्थान स्थापित किए हैं। इस वक्त भारत को छोटे स्तर पर, मसलन 500 सकल टन या उससे अधिक क्षमता वाले जहाज से, शुरुआत करनी होगी। अड़चन यह है कि जहाज के नवनिर्माण को बुनियादी ढांचा कहने से कम ब्याज दरों और विस्तारित पुनर्भुगतान समय-सारिणी के जरिए वित्त की लागत कम हो गई है, लेकिन यह सिर्फ बड़े जहाजों पर ही लागू होता है। जहाज निर्माण को बढ़ावा देने के लिए दिए जाने वाले प्रोत्साहनों में दीर्घकालिक खरीद की संभावनाओं को शामिल करना होगा। भारतीय जहाज मालिकों को भारतीय यार्डों में नए निर्माणों में निवेश करने के लिए दीर्घकालिक मांग की संभावना नहीं दिखती, क्योंकि देरी की वजह से लागत बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, भारत की हरित ईंधन उत्पादन नीति में काकीनाडा और कोच्चि के माध्यम से हरित ईंधन बनाने और निर्यात करने की परियोजनाएं शामिल हैं लेकिन उन्हें हरित जहाज बनाने और उठाव के लिए प्रेरित नहीं किया गया है। सरकारी बिजली कंपनियों से आयातित कोयले और तेल कंपनियों से आयातित कच्चे तेल के लिए दीर्घकालिक शिपिंग अनुबंध एवं टाइम चार्टर, जहाज निर्माण को बढ़ावा देंगे।
