
जब 14 मई 1948 को फिलिस्तीन में इजराइल राष्ट्र की स्थापना का एलान किया गया, तो अमेरिका ने मात्र 11 मिनट में ही उसे मान्यता दे दी। इसके बाद के सालों में, संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्यों ने इस यहूदी राष्ट्र को मान्यता प्रदान की, जोकि 1949 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया। लेकिन जब 1988 में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) ने फिलिस्तीन को एक राष्ट्र घोषित किया, तो दक्षिणी दुनिया (ग्लोबल साउथ) के अधिकांश देशों ने इसे मान्यता दे दी लेकिन शक्तिशाली पश्चिमी राष्ट्र इस तर्क के साथ इससे दूर रहे कि मान्यता सिर्फ बातचीत के जरिए दो-राष्ट्र समझौते के हिस्से के रूप में ही मिलेगी। लेकिन इस हफ्ते, संयुक्त राष्ट्र महासभा में ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने आखिरकार फिलिस्तीन को मान्यता दे दी। उनका यह कदम इजराइल के साथ उनके बिगड़ते रिश्तों और अंतिम समाधान तक पहुंचने वाली दबाव-मुक्त कूटनीतिक प्रक्रिया में उनके घटते विश्वास को दर्शाता है। पश्चिमी देशों की इस मान्यता को फिलिस्तीनियों द्वारा एक कूटनीतिक राहत के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह कदम बहुत देर से उठाया गया है – गाजा को इजराइल की सेना द्वारा तबाह कर दिया गया है; पश्चिमी तट पर यहूदी बस्तियां और इजराइली चौकियां तेजी से बढ़ी हैं; और पिछले दो सालों में इन बस्तियों की हिंसा की वजह से हजारों फिलिस्तीनी विस्थापित हुए हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुले तौर पर यह एलान किया है कि फिलिस्तीनी राष्ट्र कभी भी नहीं बनेगा और वाशिंगटन की तरफ से इजराइल को बिना शर्त समर्थन पेश है।
इस मान्यता का जमीनी स्तर पर तत्काल प्रभाव शायद न पड़े। इजराइल का सत्तारूढ़ गठबंधन द्वि-राष्ट्र समाधान पर चर्चा करने की तो छोड़िए, गाजा में नरसंहार रोकने में भी असमर्थ है। फिर भी, मान्यता की यह लहर महज एक प्रतीकात्मक कार्रवाई भर नहीं है। यह पश्चिमी देशों के बीच 1948 के बाद की इजराइल समर्थक आम सहमति में आई दरार को दर्शाती है। यूनाइटेड किंगडम ने इजराइल राष्ट्र की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई थी। फ्रांस ने इसके शुरुआती सालों में इसे हथियारों से लैस किया था और परमाणु हथियार बनाने में मदद की थी। इन शक्तियों पर उस समस्या का समाधान खोजने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है जिसमें वे शुरू से ही भागीदार रहे हैं। और फिलिस्तीनियों को अपना स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र पाने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अधिकार है। अगर इजरायल गाजा में युद्ध नहीं रोकता है, जोकि पहला कदम होना चाहिए, और पश्चिमी तट पर बस्तियां बनाना जारी रखता है, तो यूरोप को तेल अवीव पर हथियार संबंधी प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इजराइल को पश्चिमी तट पर कब्जा करने के खिलाफ चेतावनी दी जानी चाहिए और इसे एक स्पष्ट मनाहीं के बतौर लिया जाना चाहिए। यूं तो नेतन्याहू और उनके अतिवादी मंत्री अतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग हैं, लेकिन उन्हें मना नहीं किया जाएगा। लेकिन वे हमेशा सत्ता में नहीं रहेंगे। भविष्य में इजराइल का कोई नेता नेतन्याहू के सैन्यवाद को तिलांजलि दे सकता है। यह शाश्वत युद्ध और नरसंहार का ठप्पा भले ही नेतन्याहू को सत्ता पर बने रहने की सहूलियत देता है, लेकिन यह इजराइल के हितों के लिए मुफीद नहीं ही है। आज की यह मान्यता कल एक फिलिस्तीनी राष्ट्र की दिशा में एक कदम के रूप में काम करेगी। यह फिलिस्तीनियों, इजराइलियों और पश्चिम एशिया के लिए शांति का सबसे अच्छा मौका है।
