नये उपराष्ट्रपति राज्यसभा में आक्रामक शत्रुता खत्म करने में मदद कर सकते हैं

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एक किशोर के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल होने वाले 68 वर्षीय सी.पी राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति चुने गये हैं। यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा राष्ट्रवादी विचारधारा के अपने संस्करण को संघ परिवार के एजेंडे के साथ जोड़ने की एक और कोशिश है। राधाकृष्णन साल 1974 तक तमिलनाडु जन संघ की कार्यकारी समिति के सदस्य थे। एक ऐसे दौर में जब तमिलनाडु में संघ परिवार की मौजूदगी नाममात्र थी और उनका राजनीतिक जुड़ाव साफ तौर पर कैरियर से ज्यादा विचारधारा से प्रेरित था। 9 सितंबर, 2025 को वह भारत के उप-राष्ट्रपति बने, यह एक तरफ उनकी वैचारिक वफादारी का इनाम है, तो दूसरी तरफ आरएसएस की उनकी यात्रा में एक मील का पत्थर। उन्होंने 752 वैध वोटों में से 452 हासिल किये, और इंडिया ब्लॉक के उम्मीदवार जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी को 152 वोटों से पराजित किया। वह बतौर भाजपा उम्मीदवार 1998 और 1999 में कोयंबटूर से दो बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, पहले एआईएडीएमके के समर्थन से और फिर डीएमके के। उन्होंने संसदीय समितियों और शेयर बाजार घोटाले की जांच के लिए विशेष समिति में भी सेवा दी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की नुमाइंदगी भी की। साल 2004 से 2007 तक, भाजपा के राज्य अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने नदियों को जोड़ने, छुआछूत खत्म करने, आतंकवाद का मुकाबला करने, और समान नागरिक संहिता को बढ़ावा देने की वकालत करते हुए 93-दिवसीय “रथ यात्रा” निकाली।

झारखंड (2023) और महाराष्ट्र (2024) के राज्यपाल के रूप में, राधाकृष्णन ने अपने प्रशासनिक तजुर्बे को विस्तृत बनाया और अपना राजनीतिक कद ऊंचा किया, लेकिन उनकी नयी भूमिका बिल्कुल भिन्न किस्म की होगी। उपराष्ट्रपति के रूप में, उन्हें राज्यसभा के सभापति की भूमिका भी निभानी होगी, जो उनकी राजनीतिक चतुराई का इम्तिहान लेगी। वह अतीत में संघवाद और केंद्र-राज्य के बेहतर संबंधों के बारे में बात कर चुके हैं, लेकिन भाजपा और आरएसएस का आम झुकाव सत्ता के केंद्रीकरण की ओर है। हाल के वर्षों में संसद की भूमिका कमजोर हुई है, साथ ही कार्यपालिका ने अपनी शक्तियों को अभूतपूर्व स्तर तक विस्तृत कर लिया है। विधेयकों को मनमाने ढंग से वित्त विधेयक के रूप में वर्गीकृत करके राज्यसभा को खास तौर पर कमजोर किया गया है; वित्त विधेयकों को राज्यसभा की मंजूरी की जरूरत नहीं होती। राज्यों की परिषद के रूप में राज्यसभा की अवधारणा हमेशा से अमल में कम, सिद्धांत में ज्यादा रही है, लेकिन इसे जान-बूझ कर कमजोर करना हाल का विकास है। हाल के वर्षों में सरकार और विपक्ष के बीच का रिश्ता शत्रुतापूर्ण और विषाक्त हो गया है। यहां तक कि संसदीय समितियां भी चिंतनपूर्ण विचार-विमर्श के मंच से ज्यादा, बेवकूफाना बयानबाजी का मैदान बन गयी हैं। राधाकृष्णन के सामने चुनौतीपूर्ण कार्यभार है। अपनी मिलनसार तबीयत से, वह सरकार और विपक्ष को बेहतर सहयोग और कम आक्रामकता के लिए प्रेरित करने में सक्षम हो सकते हैं।

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