खारे पानी के मगरमच्छों का सर्वेक्षण और संरक्षण

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सुंदरबन बायोस्फीयर रिजर्व में खारे पानी के मगरमच्छों का हालिया सर्वेक्षण भारत में संरक्षण के लिहाज से एक उल्लेखनीय प्रगति है। यह गिनती कुल संख्या और जनसांख्यिकीय विविधता में वृद्धि की ओर इशारा करती है। यह पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) सफलता का संकेत है और इस बात का भी सूचक है कि किस तरह वन्यजीव कानून और संरक्षण नीति, धीरे-धीरे, बाघ और हाथी जैसी मुट्ठी भर आकर्षक प्रजातियों पर अटके रहने से आगे बढ़ रहे हैं। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के शुरुआती सालों में, संरक्षण उन बड़े जीवों पर गैर-आनुपातिक ढंग से केंद्रित था, जिनका आकर्षण जनमत तैयार कर सकता था। खारे पानी के मगरमच्छों को उतना ही स्नेह हासिल नहीं है, इसलिए उनकी तादाद बढ़ना दिखाता है कि कैसे जब वैधानिक ढांचे को भगबतपुर मगरमच्छ परियोजना जैसे लक्षित हस्तक्षेपों से जोड़ा जाता है, तो यह कम प्रमुख प्रजातियों के लिए भी दीर्घकालिक लाभ उत्पन्न कर सकता है। कई देशों में, सरीसृपों को अब भी अपेक्षाकृत कमजोर सुरक्षा हासिल है, जिसे अक्सर मत्स्य-क्षेत्रों (फिशरीज) या भूमि-उपयोग संबंधी चिंताओं के नीचे रखा जाता है। सुंदरबन के मगरमच्छों की संख्या में बढ़ोतरी यह बताती है कि व्यापक वैधानिक संरक्षण के साथ स्थान विशेष-आधारित कैप्टिव ब्रीडिंग और रिलीज कार्यक्रमों के मेल का भारतीय मॉडल कारगर रहा है। लेकिन समग्र रूप में, इस कानून में अब भी कुछ खामियां हैं: यह जलवायु परिवर्तन, बढ़ते खारेपन या पर्यावास विखंडन से जुड़े खतरों का पर्याप्त अनुमान नहीं लगाता। संरक्षण प्रतिक्रियाशील भी रहा है।

अतिमांसाहारी शीर्ष शिकारियों के रूप में, मगरमच्छ शिकारों की आबादी को नियंत्रित करते हैं और जल वाहिकाओं (चैनलों) से जानवरों के शवों को हटाते हैं। इसके जरिए वे दलदली वनों (मैंग्रोव) की सेहत में योगदान देते हैं। इस प्रकार, उनकी मौजूदगी इस बात का संकेत है कि इन्सानी बस्तियों, चक्रवातों और बढ़ते समुद्र-स्तर से भारी दबाव के बावजूद खाड़ियों और नदियों में अब भी खाद्य जाल काम कर रहा है। बच्चों की बेहतर उत्तरजीविता यह भी इशारा करती है कि प्रजनन पर्यावास पर्याप्त गुणवत्ता बरकरार रखे हुए हैं। यह इस डेल्टा के लिए एक महत्वपूर्ण इकोलॉजिकल सूचक है, जहां बढ़ता खारापन और क्षरण वन्यजीवन के लिए उपलब्ध स्थानों को संकीर्ण बना रहे हैं। अगर मगरमच्छों की आबादी एक स्थिर आयु संरचना (स्टेबल एज स्ट्रक्चर) स्थापित कर लेती है, तो इससे सुंदरबन के मैंग्रोव नेटवर्क के टिकाऊपन को मजबूती मिल सकती है। इस प्रजाति की विकास यात्रा इस बात को उजागर करती है कि अन्य उपेक्षित प्रजातियों के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। वन्यजीव अधिनियम की वर्तमान अनुसूचियों के साथ-साथ अग्र-सक्रिय, सुवित्तपोषित पुनरुद्धार योजनाएं भी होनी चाहिए, और जनता के साथ संवाद की रणनीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है। मगरमच्छों की संख्या इसलिए नहीं बढ़ी कि वे प्रिय हो गये हैं, बल्कि इसलिए बढ़ी कि संरक्षण एजेंसियों ने उन्हें बचाने में जोर लगाया। फोकस में इसी तरह का बदलाव अन्य प्रजातियों की मदद कर सकता है। जलवायु परिवर्तन को इसमें जोड़ना भी आवश्यक है। खारे पानी के मगरमच्छ खारेपन में काफी ज्यादा विविधता बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन कई उभयचर या मीठे पानी के सरीसृप ऐसा नहीं कर सकते। लिहाजा, जलवायु शरणस्थलों की पहचान करने और सहायता-प्रदत्त (असिस्टेड) प्रजनन के उपाय करने सहित पूर्वानुमानित कदमों की जरूरत है। यह पुनरुद्धार दिखाता है कि निरंतर तवज्जो के साथ कानून और नीति से गैर-आकर्षक प्रजातियों को फायदा मिल सकता है। भारत के लिए सबक यह है कि संरक्षण की ज्यादा समृद्ध व समावेशी दृष्टि संभव और आवश्यक है।

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