
रायपुर में बुधवार को इंडियन एयरफोर्स का एयर-शो हुआ। प्रदेश के लाखों लोग प्रत्यक्ष तौर पर इस हिस्टोरिकल एयर-शो का गवाह बने। सूर्य-किरण की टीम सबसे ज्यादा चर्चा में रही। इस स्क्वाड्रन का आदर्श वाक्य ” सदैव सर्वोत्तम “। यानी हमेशा/हर बार सबसे सर्वश्रेष्ठ। मौजूद लोगों ने ये महसूस भी किया होगा।
वहीं सूर्यकिरण के परफार्मेंस से पहले एयरफोर्स की आकाश-गंगा टीम के 6 सदस्यों ने AN-32 विमान से 8000 फीट से जंपकर एयर-शो की शुरुआत की। इस टीम के कुल 7 लोग बुधवार को सेंध लेक पर मौजूद थे। टीम लीडर वारंट ऑफिसर जितेन्द्र सिंह ग्राउंड से इंस्ट्रक्शन पास कर रहे थे।
ये सभी सात एयरफोर्स के पैरा ट्रूपर ट्रेनिंग स्कूल में इंस्ट्रक्टर्स हैं। इनके जैसे देशभर में सिर्फ 100 हैं। इनका काम है, इंडियन स्पेशल फोर्स के कमांडो और ऑफिसर्स को पैरा जंपिंग की ट्रेनिंग देना। दैनिक भास्कर ने इन सात इंस्ट्रक्टर्स से खास बातचीत की है। आसमान से उन्हें दूर तक केवल कारें और लोग ही दिखाई दे रहे थे।
टीम ने बताया कि इतनी भीड़ की उम्मीद नहीं की थी। शोर इतना था कि ग्राउंड इंस्ट्रक्शन क्लियर साउंड नहीं कर थे। इसके अलावा लैंडिंग स्पेस बहुत कम था। इन सब चीजों के चलते जंप ज्यादा चैलेंजिंग हो गई थी। इस बीच हवा कि दिशा भी अचानक बदल गई थी, लेकिन जंपर की समझदारी से एक हादसा भी टल गया।
आकाश गंगा टीम भारतीय वायुसेना की एक एरोबेटिक डिस्प्ले टीम है। जो अपने शानदार हवाई करतबों और सटीक फ्लाइंग कौशल के लिए देश-विदेश में जानी जाती है। टीम का नाम “आकाश गंगा” भारत की पौराणिक गंगा नदी के स्वर्ग से धरती पर उतरने के प्रसंग से प्रेरित है।
वारंट ऑफिसर जितेन्द्र सिंह ने बताया कि 10 अगस्त 1987 में आकाश-गंगा टीम का फार्मेशन हुआ था। इसके बाद से ही टीम के लोग देश-विदेश में कई तरह एरोबेटिक डिस्प्ले कर चुकी है
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वारंट ऑफिसर जे सिंह ने बताया कि रायपुर में बड़ी संख्या में लोग जंप देखने आए थे। हमारे जंपर्स को आसमान से केवल लोग और कारें ही नजर आ रही थीं। लैंडिंग स्पेस से ही तालाब भी लगा हुआ था। आमतौर पर लैंडिंग एरिया ओपन होता है, ताकि जंपर पूर सेफ्टी के साथ लैंड करें।
लेकिन यहां सिर्फ 40 मीटर चौड़ा और 100 मीटर लंबा स्पेस ही लैंडिंग के लिए मिला ऐसी कंडिशन जंप को चैलेंजिंग बना देती है। क्योंकि लैंडिंग के दौरान कई तरह की इमरजेंसी हो सकती है। एयर फेवरेबल न हो तो जंपर्स पानी में भी जा सकते थे।
हालांकि जंप करने वाले सभी इंस्ट्रक्टर्स हैं। सभी 500 से अधिक जंप कर चुके हैं, तो वो बेहतर जानते हैं कि इस तरह की स्थितियों से कैसे निपटना है।
वारंट ऑफिसर ने बताया कि जंप के दौरान एक समय अचानक हवा ने अपनी दिशा बदल ली। इससे एक जंपर ड्राप जोन से दूर होकर सत्य सांई हॉस्पिटल की सड़क की ओर आ गया। सड़क की बाएं ओर लोगों की भीड़ और स्ट्रीट लाइट के पोल्स लगे हुए थे। दाएं ओर की जगह खाली थी।
ऐसे में जंपर ने समझदारी दिखाई और पैराशूट को ऐन मौके पर विंड फ्लो के अपोजिट डायरेक्शन की ओर स्ट्रेच किया। इससे जंपर और पैराशूट दोनों ही भीड़ और पोल से दूर हो गए। ये उस पैरा जंपर के लिए एक परफेक्ट लैडिंग नहीं रही। लेकिन उसकी समझदारी ने हादसे को टाल दिया।
रायपुर में जंप के लिए सात पैरा जंपिंग इंस्ट्रक्टर पहुंचे थे। ये सभी स्पेशल फोर्स यानी आर्मी की पैरा स्पेशल फोर्स (SF), एयरफोर्स की गरुड़ और नैवी के मार्कोस कमांडो को ट्रेनिंग देते हैं। खास बात ये है कि पैरा जंपिंग इंस्ट्रक्टर सिर्फ एयरफोर्स के जवान या ऑफिसर्स बन सकते हैं।
लेकिन उनके लिए भी ये आसान नहीं होता। एक इंस्ट्रक्टर ही ये तय करता है कि कौन-सा जवान या ऑफिसर इंस्ट्रक्टर बन सकता है। इंस्ट्रक्टर बनने के लिए कई आवेदन आते हैं। लेकिन 100 में से सिर्फ 3-4 ही सलेक्ट होते हैं और 1-2 ही फाइनली इंस्ट्रक्टर बन पाते हैं।
सलेक्शन के बाद शुरुआती दो महीनों में सिर्फ फिजिकल ट्रेनिंग होती है, जिसे फौज की भाषा में रगड़ा कहते हैं। इसके बाद 1 महीने तक जंप की ट्रेनिंग चलती है। 2 महीने एडवांस और फिर 1 महीने इंस्ट्रक्शन कैसे देना है ये ट्रेनर अपने सीनियर के अंडर सीखता है। इसके बाद आखिरी के एक मंथ में खुद क्लास लेता है।
सब कुछ सही रहा तब जाकर एक जवान या ऑफिसर इंस्ट्रक्टर बन पाता है।
जवानों को 2 तरह की जंप की ट्रेनिंग दी जाती है। पहला स्टैटिक लाइन जंप और दूसरा फ्री फॉल। स्टैटिक लाइन जंप सैन्य पैराशूट कि वो तकनीक है, जिसमें जवान प्लेन से कूदते हैं। पैराशूट अपने-आप खुल जाता है।
वहीं फ्री फॉल जंप एक अत्यंत उन्नत सैन्य पैरा-जंपिंग तकनीक है, जिसमें कमांडो विमान से कूदकर काफी ऊंचाई तक बिना पैराशूट खोले गिरते हैं। निर्धारित ऊंचाई पर जाकर पैराशूट खोलते हैं। इसका उद्देश्य गोपनीय ऑपरेशन, रैपिड इनसेर्शन, लॉन्ग-रेंज पैठ और विशेष मिशनों में अदृश्य रूप से जमीन पर उतरना होता है।
ये जंप आमतौर पर 10 हजार फीट से अधिक ऊंचाई से की जाती है। कई मौकों पर सैनिक 30 हजार फीट ऊंचाई से भी जंप करते हैं। फ्री-फॉल तकनीक का प्रारंभ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ। 1950–60 के दशक में अमेरिकी और रूसी स्पेशल फोर्सेज ने इसे विकसित किया।
अमेरिका की यूएस आर्मी स्पेशल फोर्स और CIA ने वियतनाम युद्ध के दौरान इस तकनीक का विशेष उपयोग किया। इसके बाद SAS (यूके), रूसी स्पेत्सनाज और दूसरे प्रमुख देशों की स्पेशल फोर्सेज ने इसे अपनाया।
रायपुर एयर शो…फाइटर जेट्स ने आसमान में दिल-तिरंगा बनाया:सूर्यकिरण टीम ने दिखाए फॉर्मेशन, आकाश-गंगा की टीम ने लगाई छलांग, एयरपोर्ट से साईं-हॉस्पिटल तक जाम
एयर शो देखने के लिए नवा रायपुर जाने वाली सड़क पर भीड़ उमड़ गई है। बड़ी संख्या में लोग वाहनों से पहुंच रहे हैं।
Author: The Suryadon
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