बाघ संरक्षण नीति उचित ही लोगों को अतिक्रमणकारी नहीं, हितधारक मानती है

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केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की नयी नीतिगत रूपरेखा यह याद दिलाती है कि भारत की संरक्षण रणनीति कोई किला संरक्षण मॉडल नहीं है, बल्कि ऐसा मॉडल है जिसमें देश के बाघों की हिफाजत करना एक सामाजिक अनुबंध है। इस नीति की सबसे बड़ी खूबी यह दोहराना है कि जंगलों के पास या भीतर रहने वाले लोगों को ‘वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006’ प्रक्रिया पूरी होने तक तक दूसरी जगह नहीं बसाया जा सकता, जो यह तस्दीक करता है कि वे हितधारक (स्टेकहोल्डर) हैं, अतिक्रमणकारी नहीं। अफसोस की बात है कि यह विचार स्वीकार्यता खोता जा रहा है, खासकर यह देखते हुए कि सरकार, दिनोंदिन और ज्यादा, जंगलों को केवल जलवायु संबंधी उपयोगिता के लिए देख रही है और न्यायपालिका लंबे समय से चल रहे विवाद निपटाने को उत्सुक है। दूसरी जगह बसाने को एक “अपवादस्वरूप” कदम बताने वाली यह नीति, बाघ रिजर्व क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर गांवों को हटाने के साल 2024 के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण निर्देश को भी पलट देती है। इन्सानों और बाघों को परस्पर अपवर्जी (जिनका एक साथ होना असंभव हो) मानने के बजाय, यह रूपरेखा टिकाऊ (सस्टेनबल) सह-वास पर शोध और पायलट परियोजनाओं को प्रोत्साहित करती है, जिससे एक ज्यादा सामाजिक वैध, और शायद ज्यादा सशक्त मॉडल के जरिए बाघ संरक्षण को पुनर्परिभाषित करने में मदद मिल सकती है। गैरकानूनी बेदखली के लिए इसके द्वारा अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का इस्तेमाल और समाधान के लिए त्रि-स्तरीय प्रणाली भी एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं, जो इन समुदायों को विरले ही उपलब्ध हो पाता है।

खैर, जंगल पर निर्भर समुदायों की जरूरतें भिन्न होती हैं : कुछ अस्पतालों और स्कूलों की उम्मीद करते हैं, जबकि अन्य पारंपरिक जीवनशैली बचाने के लिए लड़ते हैं। लेकिन साथ ही, बाघ संवेदनशील होते हैं और यही कारण है कि बहुत से संरक्षणविद इन सर्वोच्च शिकारी जीवों के संरक्षण के लिए मानव-मुक्त कोर क्षेत्र को आवश्यक मानते हैं। वैज्ञानिक आधार पर बाघों की हिफाजत के राष्ट्रीय मिशन के लिए ऐसे क्षेत्र सुनिश्चित करने की जरूरत है। मूलत:, एक राष्ट्रीय नीति अधिकारों की हिफाजत करती है, लेकिन विशिष्ट स्थानीय दशाओं के प्रति संवेदनशील सूक्ष्मता-भरी प्रणालियां लोगों और बाघों के टिकाऊ सह-अस्तित्व के लिए बेहद अहम हैं। हालांकि ऐसी प्रणालियां शीर्ष-स्तरीय मंत्रालयों की क्षमता के बाहर होती हैं। संरक्षण प्रतिष्ठान इस नयी नीति का विरोध कर सकता है क्योंकि यह बाघ पर्यावासों को सुदृढ़ बनाने के प्रयासों को धीमा कर सकता है और जमीनी स्तर पर संभावित दोहरी नीतियों के चलते क्रियान्वयन का बोझ बढ़ा सकता है। वास्तव में, भारत में संरक्षण मुख्यत: पर्यावरण मंत्रालय के तहत वन विभागों द्वारा नियंत्रित है और राज्यों को एफआरए के क्रियान्वयन में व्यापक लचीलापन हासिल है। उन जगहों में भी जहां स्थानीय विभाग काफी नियंत्रण रखते हैं, प्रस्तावित ‘समुदाय-केंद्रित संरक्षण और दूसरी जगह बसाने के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा’ लागू नहीं करने वाले राज्यों में जबरन दूसरी जगह बसाना जारी रह सकता है। मौजूदा नीति मुआवजा मानदंडों और एक टिकाऊ आबादी के लिए न्यूनतम अलंघ्य क्षेत्र को परिभाषित करती है, लेकिन इनका क्रियान्वयन अक्सर स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। जिस तरह किला मॉडल व्यवहार में लोगों के अधिकारों के प्रति अक्सर असंवेदनशील रहा है, उसी तरह इससे निकलने का मतलब ऐसे किले में प्रवेश नहीं होना चाहिए जिसमें भारत की प्राकृतिक संपदा को त्याग दिया जाए।

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