यौन हिंसा बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए, साथ ही पीड़ितों के लिए समर्थन होना चाहिए

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कभी-कभी, सबसे स्वाभाविक चीजें सबसे कठिन लड़ाई के बाद हासिल होती हैं। बिना रजामंदी के जबरदस्ती करके चोट पहुंचाने, बलात्कार करने, डराने या तंग करने को आपराधिक कृत्य स्थापित करने के लिए, फ्रांस को यह स्थापित करने में वर्षों लग गये कि “जबरदस्ती अपराध है”। एक महिला ने असाधारण साहस दिखाया और एक विद्रोह उभरा जिसमें अन्य महिलाएं उसके साथ एकजुटता में खड़ी हुईं। फ्रांस ने एक कानून बनाया है जो बलात्कार को किसी भी गैर-रजामंदी वाली यौन क्रिया के रूप में परिभाषित करता है। यह देश की महिलाओं के लिए मील का पत्थर है, लेकिन कुल मिलाकर, यौन हिंसा के खिलाफ प्रहार है। यह कानून समाज की इस फौरी मांग की प्रतिक्रिया में पारित किया गया कि कानून में रजामंदी को शामिल किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कानून यौन स्वायत्तता की हिफाजत करे, खासकर महिलाओं के संदर्भ में। पिछले साल, जीजेल पेलीको ने अपनी सबसे कठिन लड़ाई लड़ी जब वह एक मामले में अदालत में खड़ी हुईं, जिसमें उन्होंने अपने पति पर नशीली दवाएं देने और कुछ बिल्कुल अजनबियों सहित कई पुरुषों को उनका बलात्कार करने देने का आरोप लगाया। पिछले साल दिसंबर में, अदालत ने इस मामले में 51 लोगों को दोषी ठहराया। लेकिन, इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि किस प्रकार यह मामला रजामंदी को कानून के स्तंभ के रूप में स्थापित करने के लिए परिवर्तनकारी क्षण बन गया। यह भलीभांति स्थापित है कि यौन हिंसा के पीड़ितों को अपना मामला अदालत तक लाने के लिए एक मुश्किल सफर से गुजरना पड़ता है और कमजोर सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाली कई महिलाओं के पास वास्तव में यह अधिकार भी नहीं होता। बलात्कार के मामलों में बहुत ज्यादा कलंक जुड़ा है और उससे भी बुरा यह कि पीड़ितों को आंका जाता है, जैसा कि भारत में नेताओं द्वारा महिलाओं को दोषी ठहराने वाले हालिया बयानों ने तकलीफदेह ढंग से बार-बार इस तथ्य को रेखांकित किया है। बलात्कार के किसी मामले के सुनवाई के चरण में पहुंचने पर भी, दोषसिद्धि हासिल होने की संभावना बहुत उत्साजनक नहीं होती। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2018 से 2022 तक, बलात्कार के लिए दोषसिद्धि दर 27 फीसदी से 28 फीसदी के बीच थी। और यह इस तथ्य के बावजूद है कि भारतीय न्याय संहिता “आपराधिक जबरदस्ती” को मान्यता देती है।

न्यायिक प्रक्रिया की आधारशिला के रूप में यौन स्वायत्तता को स्थापित करना भले ही पहला कदम है, लेकिन यही सब कुछ नहीं है। यौन हिंसा रोकने में, लैंगिक भूमिकाओं पर समुदाय के विचारों को गढ़ने, कठोर पितृसत्तात्मक संहिताओं को कानून के जरिए ध्वस्त करने के अलावा, कम उम्र से शुरू होने वाले जागरूकता कार्यक्रम और इन सिद्धांतों की ओर पुलिस को उन्मुख करने के साथ-साथ, सदमे से उबरने में पीड़ितों की सहायता के लिए संसाधन मुहैया कराने को भी शामिल करना होगा। आगे की डगर लंबी और कठिन है। पीड़ितों का सफर आसान बनाने के लिए, सरकारों को यौन हिंसा को पूरी तरह नाकाबिले बर्दाश्त बनाने और पीड़ितों के साथ खड़े होने, जांच व मुकदमा चलने की प्रक्रियाओं में हमदर्दी से पेश आने से शुरुआत करनी चाहिए। इससे कुछ भी कम, अन्याय होगा जो पेलीको द्वारा खड़े किये गये महिलाओं के ‘अरब स्प्रिंग’ की त्वरा को न्यायिक प्रक्रिया की आधारशिला के रूप में यौन स्वायत्तता को स्थापित करना भले ही पहला कदम है, लेकिन यही सब कुछ नहीं है। यौन हिंसा रोकने में, लैंगिक भूमिकाओं पर समुदाय के विचारों को गढ़ने, कठोर पितृसत्तात्मक संहिताओं को कानून के जरिए ध्वस्त करने के अलावा, कम उम्र से शुरू होने वाले जागरूकता कार्यक्रम और इन सिद्धांतों की ओर पुलिस को उन्मुख करने के साथ-साथ, सदमे से उबरने में पीड़ितों की सहायता के लिए संसाधन मुहैया कराने को भी शामिल करना होगा। आगे की डगर लंबी और कठिन है। पीड़ितों का सफर आसान बनाने के लिए, सरकारों को यौन हिंसा को पूरी तरह नाकाबिले बर्दाश्त बनाने और पीड़ितों के साथ खड़े होने, जांच व मुकदमा चलने की प्रक्रियाओं में हमदर्दी से पेश आने से शुरुआत करनी चाहिए। इससे कुछ भी कम, अन्याय होगा जो पेलीको द्वारा खड़े किये गये महिलाओं के ‘अरब स्प्रिंग’ की त्वरा को बाधित करेगा।

 

 


The Suryadon
Author: The Suryadon

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