मोदी-नीतीश बार-बार क्यों कह रहे जंगलराज न लौटे:

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पहले फेज का चुनाव प्रचार खत्म हो गया। 6 नवंबर को 18 जिलों की 121 सीटों और 11 नवंबर को 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी।

इस चुनाव में NDA ने कथित जंगलराज को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। PM मोदी हो या CM नीतीश कुमार, सब एक सुर में जंगलराज की बात कर रहे हैं।

यह स्थिति तब है जब लालू-राबड़ी का शासन गए 20 साल हो गए हैं। NDA के जंगलराज की कांट में महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव नौकरी-विकास और गुंडा राज की बातें कह रहे हैं।

आखिर 20 साल बाद भी NDA क्यों कथित जंगलराज को चुनावी मुद्दा बनाए हुए है, इससे तेजस्वी को नुकसान होगा कि फायदा; जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…

सवाल-1ः NDA की ओर से जंगलराज को लेकर क्या कहा जा रहा है?

जवाबः चुनाव प्रचार में NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का हर नेता PM नरेंद्र मोदी, CM नीतीश कुमार, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान तक जंगलराज को मुद्दा बना रहे हैं। वहीं, महागठबंधन नीतीश सरकार के लिए गुंडा राज शब्द का इस्तेमाल कर रहा है।

NDA के नेताओं का बयान…

  • 24 अक्टूबर को PM मोदी ने समस्तीपुर और बेगूसराय में पहली चुनावी रैली की। उन्होंने अपने भाषण में 30 बार जंगलराज शब्द का इस्तेमाल किया। मोदी हर सभा में जंगलराज का जिक्र कर रहे हैं। उन्होंने नारा दिया, ‘फिर एक बार NDA सरकार, फिर एक बार सुशासन सरकार, जंगलराज वालों को दूर रखेगा बिहार।’
  • 16 अक्टूबर को समस्तीपुर के सरायरंजन में अपनी पहली सभा में CM नीतीश कुमार ने कहा- पहले बहुत बुरा हाल था। शाम के बाद कोई घर के बाहर नहीं निकलता था। उनके समय में हिंदू-मुस्लिम झगड़े होते थे। बहुत कम बच्चे पढ़ते थे। बिहार के विकास का काम लगातार हो रहा है। अब डर और भय का वातावरण नहीं है।
    • 16 अक्टूबर को छपरा के तरैया में अपनी पहली सभा में अमित शाह ने लोगों से पूछा बिहार में विकास चाहिए या जंगलराज। इस पर भीड़ ने जवाब दिया-विकास। इस पर शाह ने कहा, ‘यह स्पष्ट संकेत है कि जनता अब फिर से लालू राज नहीं चाहती।’

    सवाल-2ः आखिर ‘जंगलराज’ शब्द बिहार की राजनीति में कब और कैसे आया?

    जवाबः ‘जंगलराज’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल 1997 में किया गया। तब लालू यादव चारा घोटाले के आरोप में CM पद से इस्तीफा दे चुके थे और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। उस वक्त पटना में जलभराव हो गया। पानी निकालने की व्यवस्था काम नहीं कर रही थी।

    इसको लेकर अगस्त 1997 में पटना हाईकोर्ट में याचिका डाली गई। कोर्ट ने सुनवाई करते हुए टिप्पणी की- पटना की स्थिति जंगलराज वाली हो गई है।

    कोर्ट की इस टिप्पणी को भाजपा और समता पार्टी (अब JDU) ने लालू-राबड़ी शासन काल से जोड़ा और खूब प्रचारित किया। विरोधी इस शब्द को लालू-राबड़ी सरकार के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

    लोगों के मन में कथित जंगलराज का खौफ क्यों?

    लालू-राबड़ी काल (1990-2005) में हत्या, किडनैपिंग और जातीय हिंसा खूब फैली। आंकड़ों से समझिए…

    • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB और स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी SCRB के मुताबिक, 1991-2001 के बीच 58 नरसंहार हुए। इसमें 566 लोग मारे गए।
    • 2001-2004 के बीच 1527 अपहरण के मामले दर्ज हुए, जिनमें फिरौती भी मांगी गई। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो 2006-09 के बीच यह संख्या घटकर 429 हो गई।
    • लेखक मृत्युंजय शर्मा अपनी किताब ‘ब्रोकन प्रॉमिसेसः कास्ट, क्राइम एंड पॉलिटिक्स इन बिहार’ में उस समय की परिस्थिति पर लिखते हैं, ‘सामाजिक न्याय की आड़ में राज्य की संस्थाओं को सधे तरीके से कमजोर किया गया है। तंग आकर 1992 में 384 IPS अफसरों में से 144 ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की मांग की।

      वहीं, तेजस्वी यादव का कहना है कि 20 साल के नीतीश सरकार में 60,000 मर्डर हुए हैं। कानून-व्यवस्था चौपट हो गई है। यहां गुंडा राज है।

      सवाल-3ः 20 साल बाद भी NDA कथित जंगलराज के नैरेटिव को जोर क्यों दे रहा?

      जवाबः एक्सपर्ट इसके पीछे 3 बड़े कारण बताते हैं…

      1. 20 साल का एंटी इनकंबेंसी को दूर करना

      पॉलिटिकल एनालिस्ट सज्जन कुमार सिंह कहते हैं, ‘बिहार में नीतीश कुमार 20 साल से सत्ता में हैं। उनके साथ कुछ समय को छोड़कर भाजपा भी सत्ता में हैं। ऐसे में इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण एंटी इंकम्बेंसी तो होगी। इसको दूर करने के लिए सरकार विपक्ष के चेहरे पर चस्पा ‘जंगलराज’ को भुनाना चाहती है।’

      सज्जन कुमार सिंह कहते हैं, ‘जंगलराज सिर्फ हत्या-मर्डर को लेकर ही नहीं कहा जाता है। इस दौर की जब बात होती है तो विकास की भी बातें होती है। चूंकि यह वह दौर था, जब देश के बाकी राज्य विकास के नए मुकाम हासिल कर रहे थे और बिहारी पलायन करने को मजबूर थे। लालू-राबड़ी सरकार में कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसे नहीं थे। बेसिक जरूरत के संसाधन भी नहीं थे। सड़कें, इंडस्ट्री, बिजली की स्थिति बुरी थी।’

      एक्सपर्ट की बातों को आंकड़ों से समझिए…

      • लालू यादव जब CM बने (1990-91 में) तब बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का लगभग 45% थी। 2000 के आखिर तक यह घटकर सिर्फ 25% रह गई। यानी, अगर देश में एक व्यक्ति औसतन 100 रुपए कमा रहा था, तो बिहार का आदमी सिर्फ 25 रुपए कमा रहा था।
      • भारत की कुल GDP में बिहार की हिस्सेदारी 1990-91 में करीब 4.5% थी, जो 2000 के दशक की शुरुआत तक घटकर सिर्फ 2.8% रह गई।
        • 2020 विधानसभा चुनाव में 54.6% पुरुष ने तो 59.7% महिलाओं ने वोट डाले। मतलब पुरुषों की तुलना में 5% ज्यादा।
        • 2020 में 243 विधानसभा सीट में से 167 सीटें ऐसी थी, जहां महिलाओं ने पुरुषों से अधिक वोट डाले। इनमें से 90 सीटों पर NDA जीता। NDA ने कुल 125 सीटें जीता था।
        • 2010 और 2015 में भी महिलाओं ने नीतीश कुमार की सरकार बनवाई थी। 2010 में पुरुषों की तुलना में 1.5% और 2015 में 9% महिलाओं ने ज्यादा वोटिंग की थी।

          वह बताते हैं, ‘चूंकि महागठबंधन के कार्यकर्ता सत्ता पाने के लिए बेकरार हैं। वह एग्रेसिव हैं। क्योंकि वह 20 साल से सत्ता से दूर हैं। उनको सत्ता चाहिए। उसकी तुलना में NDA के कार्यकर्ता थोड़ी उम्मीद में नजर आ रहे हैं।’

          सवाल-4ः तेजस्वी कथित जंगलराज की परछाई से क्यों नहीं बच पा रहे?

          जवाबः इसके 2 बड़े कारण हैं…

          1. बाहुबलियों को दूर नहीं कर पा रही पार्टी

          RJD के टिकट बंटवारे को देखें तो पता चलता है कि पार्टी दबंग छवि और बाहुबलियों को नहीं छोड़ पा रही है। RJD 143 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसमें 9 कैंडिडेट बाहुबली या उनके परिवार वाले हैं। ये वो बाहुबली हैं, जिनका रूतबा लालू-राबड़ी शासन काल में बहुत था।

          1. मोकामा से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी।
          2. वारिसलीगंज से अशोक महतो की पत्नी अनिता देवी।
          3. लालगंज से मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला।
          4. दानापुर से बाहुबली रीतलाल यादव।

          वह बताते हैं, ‘चूंकि महागठबंधन के कार्यकर्ता सत्ता पाने के लिए बेकरार हैं। वह एग्रेसिव हैं। क्योंकि वह 20 साल से सत्ता से दूर हैं। उनको सत्ता चाहिए। उसकी तुलना में NDA के कार्यकर्ता थोड़ी उम्मीद में नजर आ रहे हैं।’

          सवाल-4ः तेजस्वी कथित जंगलराज की परछाई से क्यों नहीं बच पा रहे?

          जवाबः इसके 2 बड़े कारण हैं…

          1. बाहुबलियों को दूर नहीं कर पा रही पार्टी

          RJD के टिकट बंटवारे को देखें तो पता चलता है कि पार्टी दबंग छवि और बाहुबलियों को नहीं छोड़ पा रही है। RJD 143 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसमें 9 कैंडिडेट बाहुबली या उनके परिवार वाले हैं। ये वो बाहुबली हैं, जिनका रूतबा लालू-राबड़ी शासन काल में बहुत था।

          1. मोकामा से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी।
          2. वारिसलीगंज से अशोक महतो की पत्नी अनिता देवी।
          3. लालगंज से मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला।
            1. मोकामा से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी।
            2. वारिसलीगंज से अशोक महतो की पत्नी अनिता देवी।
            3. लालगंज से मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला।
            4. दानापुर से बाहुबली रीतलाल यादव।
            5. रघुनाथपुर से दिवंगत शहाबुद्दीन के बेटा ओसामा।
            6. बाढ़ से कर्णवीर सिंह उर्फ लल्लू मुखिया।
            7. संदेश से अरुण यादव के बेटे दीपू राणावत।दानापुर से बाहुबली रीतलाल यादव।बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, 2004-05 से 2010-11 के बीच राज्य की ग्रोथ रेट लगभग 11% तक पहुंच गई, जबकि इससे पहले के पांच सालों (राबड़ी देवी के शासन में) यह सिर्फ 3.5% थी।कुल मिलाकर मतलब यह कि जब तेजस्वी नीतीश कुमार के विकास पर सवाल उठा रहे हैं तो उसके काट में NDA अपने विकास के साथ-साथ लालू-राबड़ी शासन के विकास की भी तुलना कर रहा है।

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              सवाल-4ः तेजस्वी कथित जंगलराज की परछाई से क्यों नहीं बच पा रहे?

              जवाबः इसके 2 बड़े कारण हैं…

              1. बाहुबलियों को दूर नहीं कर पा रही पार्टी

              RJD के टिकट बंटवारे को देखें तो पता चलता है कि पार्टी दबंग छवि और बाहुबलियों को नहीं छोड़ पा रही है। RJD 143 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसमें 9 कैंडिडेट बाहुबली या उनके परिवार वाले हैं। ये वो बाहुबली हैं, जिनका रूतबा लालू-राबड़ी शासन काल में

            ला वोट

            1. मोकामा से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी।
            2. वारिसलीगंज से अशोक महतो की पत्नी अनिता देवी।
            3. लालगंज से मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला।
            4. दानापुर से बाहुबली रीतलाल यादव।
            5. रघुनाथपुर से दिवंगत शहाबुद्दीन के बेटा ओसामा।
            6. बाढ़ से कर्णवीर सिंह उर्फ लल्लू मुखिया।
            7. संदेश से अरुण यादव के बेटे दीपू राणावत।
            8. बेलागंज से सुरेंद्र यादव के बेटे विश्वनाथ यादव।
            9. रूपौली से अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती।

            जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर

            रों को गोलबंद करने की कोशिश

            पॉलिटिकल एनालिस्ट सज्जन कुमार सिंह कहते हैं, ‘बिहार में महिला वोटरों की लामबंदी NDA के पक्ष में रही है। उनके लिए सुरक्षा एक बड़ा मसला है। घर की औरतों को जंगलराज का वह दौर याद है, जब वह अपने बच्चों और पति को शाम से पहले सकुशल घर लौटने का इंतजार करती थीं।’

            सज्जन कुमार सिंह कहते हैं, ‘हाल के सालों में तेजस्वी ने महिलाओं को तरह-तरह के वादे करके लुभाने का प्रयास किया है। नीतीश सरकार ने भी उनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चलाईं है। ऐसे में जंगलराज के मामले को उठाकर NDA उनको लामंबद

        जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर RJD को लेकर कहते हैं, ‘लालू-राबड़ी शासन काल के नेता आज भी RJD में हैं। अगर सत्ता में आए तो वही लोग पार्टी और सरकार चलाएंगे। 20 सालों में सिर्फ चेहरा बदला है। लालू की जगह तेजस्वी।’

        कसद

        सीनियर जर्नलिस्ट संजय सिंह बताते हैं, ‘चुनाव को लेकर लोगों में गहमागहमी जैसा माहौल नहीं है। आसान शब्दों में कहे तो ठंडा चुनाव है। चुनाव जब ठंडे माहौल में होता है तो कार्यकर्ता सो जाते हैं। मतलब कि वह बूथ तक पहुंचने की कोशिश नहीं करते। उनको रिचार्ज करने के लिए NDA जंगलराज की याद दिला रही है।’

        2. सामाजिक आधार लालू-राबड़ी वाला ही

        लालू यादव दशकों तक MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण की राजनीति करते रहे हैं। तेजस्वी यादव उससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन टिकट बंटवारे को देखें तो उन्होंने 143 में 70 कैंडिडेट इसी समीकरण को दिए हैं। मतलब 49%।

        पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘तेजस्वी यादव A टू Z की बातें करते हैं। वह अतिपिछड़ा की बातें करते हैं, लेकिन उन्होंने EBC को सिर्फ 11 टिकट दिया है, जो 2020 से 15 कम है। लालू-राबड़ी शासन काल में यादवों ने दलित और EBC समाज को सबसे ज्यादा परेशान किया था। जब तेजस्वी भी यादवों और मुस्लिमों को अधिक टिकट देंगे तो परसेप्शन तो लालू-राबड़ी वाला ही बनेगा ना।’

        सवाल-5ः ‘जंगलराज’ के नैरेटिव से तेजस्वी के चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

        जवाबः पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘बिहार सभी जाति धर्म के लोगों का है। लालू-राबड़ी शासन में एक जाति विशेष के लोगों की उदंडता की बातें होती है। उससे फॉरवर्ड और EBC तबके के वोटरों पर असर पड़ता है। वह RJD के खिलाफ गोलबंद होते हैं और NDA के साथ चले जाते हैं।’

        सीनियर जर्नलिस्ट मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ‘जंगलराज एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें शासन ‌व्यवस्था की सारी कमजोरियां हैं। NDA उसे छोड़ना नहीं चाहती, क्योंकि वही एक ऐसा मुद्दा है जिसका जवाब तेजस्वी यादव के पास नहीं है। 2020 में नीतीश कुमार की बहुत बुरी स्थिति थी। तेजस्वी और महागठबंधन का उभार दिख रहा था। तब PM मोदी ने तेजस्वी को जंगलराज के राजकुमार की उपमा दी। लोगों को पुरानी घटनाओं की याद दिलाई और बाजी पलट दी। इसलिए इसबार भी NDA अपने पुराने जंगलराज के मुद्दे को हवा देकर लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।’

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