वर्ष 1995 में जब भारत दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (आसियान) का वार्ता साझेदार बना तथा 2002 में जब इसका दर्जा बढ़ाकर शिखर सम्मेलन स्तर का किया गया, तब से आसियान का सालना शिखर सम्मेलन भारत के लिए ऐतिहासिक संबंधों वाले तथा अब बढ़ते भू-राजनैतिक महत्व वाले क्षेत्र के साथ फिर से जुड़ने का मौका रहा है। आसियान और आसियान-भारत शिखर सम्मेलनों के अलावा, हर साल आयोजित होने वाला पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, भारत और आसियान के सदस्य देश शामिल हैं) भारतीय नेतृत्व के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मुद्दों पर सबसे शक्तिशाली देशों के साथ बातचीत करने का एक अवसर है। मिसाल के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान-अमेरिका ‘क्वाड’ का पुनर्जन्म एक दशक के लंबे अंतराल के बाद 2017 में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान ही हुआ था। रविवार को कुआलालम्पुर में आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में अपने वर्चुअल भाषण में इस महत्व को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 21वीं सदी को “भारत और आसियान की सदी” कहा और “आसियान की एकता, आसियान की केंद्रीयता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बारे में आसियान के नजरिए” के प्रति भारत के समर्थन की प्रतिबद्धता जाहिर की। उन्होंने यह भी एलान किया कि 2026 आसियान-भारत समुद्री सहयोग का साल होगा, जिसमें मानवीय सहायता एवं आपदा के दौरान प्रतिक्रिया, समुद्री सुरक्षा और इस क्षेत्र की नीली अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह शिखर सम्मेलन – जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किया – ऐसे समय में हुआ जब भू-राजनैतिक उथल-पुथल बढ़ रही है, जिसमें अमेरिका की टैरिफ नीति से उत्पन्न आर्थिक उथल-पुथल, महत्वपूर्ण निर्यातों पर चीन की बाधाएं और समुद्री तनाव शामिल हैं। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में, जयशंकर ने वक्त को “ “जटिल” बताया और रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को बाधित करने एवं अपने सिद्धांतों को “चुनिंदा” तरीके से लागू करने के लिए अमेरिका तथा आपूर्ति श्रृंखला की विश्वसनीयता और बाजार की सुलभता से जुड़े मुद्दों के लिए चीन पर निशाना साधा। भारत और आसियान ने आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौते (एआईटीआईजीए) की समीक्षा को शीघ्र ही अंतिम रूप देने की भी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
हालांकि, सख्त बयान और सहयोग के प्रति प्रतिबद्धता, इस शिखर सम्मेलन में मोदी की गैरहाजिरी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं थे – वे 2022 में भी गैरहाजिर रहे थे। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कहा कि मोदी ने भारत में होने वाले उत्सवों के कारण इसमें भाग लेने में असमर्थता जताई थी। लेकिन यह स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था, क्योंकि आसियान देशों के साथ होने वाले इस कार्यक्रम की योजना महीनों पहले ही बना ली गई थी। जहां कुछ लोगों ने बिहार विधानसभा चुनावों के लिए मोदी के प्रचार कार्यक्रम की ओर इशारा किया, वहीं अन्य लोगों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदगी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से जुड़े तनाव को इस सम्मेलन से उनके दूर रहने का संभावित कारण बताया। कुछ लोगों ने तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मलेशिया के राजनयिक समर्थन और इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुआलालम्पुर यात्रा के कारण भारत-मलेशिया संबंधों में आए तनाव की बात भी कही। मोदी के पास अंतरराष्ट्रीय, घरेलू या द्विपक्षीय वजहें हो सकती हैं, लेकिन उनका इस सम्मेलन न जाना एक मौके को गंवा देने जैसा था, खासकर तब जब अमेरिका और चीन सहित अन्य वैश्विक ताकतों ने महज वहां उपस्थित होकर ही क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित कर दी।
Author: The Suryadon
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