
आत्मनिर्भर भारत एक आकांक्षा भरा आदर्श है जिसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन एक सतत गुणवत्ता नियंत्रण ढांचे की स्थापना के बगैर नहीं। एक के बाद एक मौकों पर, ‘मेकिंग इन इंडिया’ के लक्ष्य के लिए गंभीर खतरे पैदा होते रहे हैं, खासकर दवा क्षेत्र में। कफ सिरपों की गुणवत्ता का मुद्दा बार-बार उठाया जाता रहा है, और वैश्विक दवा क्षेत्र में बड़ी महत्वाकांक्षाएं रखने वाले भारत में उस चीज की अक्सर कमी रही है जो एक मजबूत और भरोसेमंद उद्योग बनाने के लिए जरूरी होती है। हाल ही में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भारत में फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए संशोधित शिड्यूल एम मानदंडों के अनुरूप, सभी भारतीय दवा निर्माताओं से सख्त औषधि अनुपालन (ड्रग कम्पलायंस) की मांग की। यह कदम तमिलनाडु औषधि नियंत्रण विभाग की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया, जिसमें एक निजी कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप ‘कोल्डरिफ’ के नमूनों में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) स्वीकार्य सीमा से ज्यादा पाया गया। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कम-से-कम 14 बच्चों की हालिया मौतों का कारण कफ सिरप के होने के संदेह के बाद, जांचें शुरू की गयीं। अजीब बात है कि जहां स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन दो राज्यों से लिये गये नमूनों की आरंभिक जांचों में डीईजी की मौजूदगी से इनकार किया, वहीं तमिलनाडु द्वारा राज्य के अंदर से उठाये गये बैचों में से एक में यह पाया गया। तमिलनाडु के औषधि नियंत्रण विभाग ने निर्माण सुविधा के भीतर, औषधि नियमावली की ‘निर्माण संबंधी अच्छी कार्यप्रणाली’ और ‘प्रयोगशाला से जुड़ी अच्छी कार्यप्रणाली’ में कई गैर-अनुपालन कारक भी दर्ज किये। उसकी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि यह संदूषित बैच एक्सिपिएंट के रूप में नॉन-फार्माकोपियल ग्रेड (दवा निर्माण के लिए अनुपयुक्त ग्रेड) के प्रोपिलीन ग्लाइकॉल का इस्तेमाल करके बनाया गया। यह भी उल्लेख किया गया कि इसने दवा को डीईजी और एथिलीन ग्लाइकॉल से संदूषित किया हो सकता है, जिन्हें गुर्दे को क्षति पहुंचाने वाले विषाक्त पदार्थों के रूप में जाना जाता है। केंद्रीय औषधि मानकनियंत्रण संगठन ने इस फर्म का मैन्यूफैक्चरिंग लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की है। इस दरम्यान, एक डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसने मध्य प्रदेश में मरने वाले कई बच्चों को कथित तौर कफ सिरप देने की सलाह दी थी।
आत्मनिर्भर भारत एक आकांक्षा भरा आदर्श है जिसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन एक सतत गुणवत्ता नियंत्रण ढांचे की स्थापना के बगैर नहीं। एक के बाद एक मौकों पर, ‘मेकिंग इन इंडिया’ के लक्ष्य के लिए गंभीर खतरे पैदा होते रहे हैं, खासकर दवा क्षेत्र में। कफ सिरपों की गुणवत्ता का मुद्दा बार-बार उठाया जाता रहा है, और वैश्विक दवा क्षेत्र में बड़ी महत्वाकांक्षाएं रखने वाले भारत में उस चीज की अक्सर कमी रही है जो एक मजबूत और भरोसेमंद उद्योग बनाने के लिए जरूरी होती है। हाल ही में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भारत में फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए संशोधित शिड्यूल एम मानदंडों के अनुरूप, सभी भारतीय दवा निर्माताओं से सख्त औषधि अनुपालन (ड्रग कम्पलायंस) की मांग की। यह कदम तमिलनाडु औषधि नियंत्रण विभाग की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया, जिसमें एक निजी कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप ‘कोल्डरिफ’ के नमूनों में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) स्वीकार्य सीमा से ज्यादा पाया गया। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कम-से-कम 14 बच्चों की हालिया मौतों का कारण कफ सिरप के होने के संदेह के बाद, जांचें शुरू की गयीं। अजीब बात है कि जहां स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन दो राज्यों से लिये गये नमूनों की आरंभिक जांचों में डीईजी की मौजूदगी से इनकार किया, वहीं तमिलनाडु द्वारा राज्य के अंदर से उठाये गये बैचों में से एक में यह पाया गया। तमिलनाडु के औषधि नियंत्रण विभाग ने निर्माण सुविधा के भीतर, औषधि नियमावली की ‘निर्माण संबंधी अच्छी कार्यप्रणाली’ और ‘प्रयोगशाला से जुड़ी अच्छी कार्यप्रणाली’ में कई गैर-अनुपालन कारक भी दर्ज किये। उसकी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि यह संदूषित बैच एक्सिपिएंट के रूप में नॉन-फार्माकोपियल ग्रेड (दवा निर्माण के लिए अनुपयुक्त ग्रेड) के प्रोपिलीन ग्लाइकॉल का इस्तेमाल करके बनाया गया। यह भी उल्लेख किया गया कि इसने दवा को डीईजी और एथिलीन ग्लाइकॉल से संदूषित किया हो सकता है, जिन्हें गुर्दे को क्षति पहुंचाने वाले विषाक्त पदार्थों के रूप में जाना जाता है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने इस फर्म का मैन्यूफैक्चरिंग लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की है। इस दरम्यान, एक डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसने मध्य प्रदेश में मरने वाले कई बच्चों को कथित तौर कफ सिरप देने की सलाह दी थी
मौजूदा मामले में स्थिति से निपटने के लिए ये कदम ठीक हैं, लेकिन भारतीय राज्य को खराब गुणवत्ता के लिए कोई भी गुंजाइश खत्म करनी होगी। बाज जैसी निगरानी और उल्लंघन पाये जाने पर कार्रवाई जरूरी है। मौतें होने के बाद ही कार्रवाई करना आपराधिक है; जिसकी कोई सफाई नहीं हो सकती। प्रमाणित ‘प्रयोगशाला संबंधी अच्छी कार्यप्रणाली’ की रूपरेखा पहले से मौजूद है; बस जरूरत है ऐसे प्रत्येक उल्लंघन की सूचना को गंभीरता से लेने की, साथ ही दवा के बैचों की नियमित और औचक निरीक्षण की, जिसमें हर उल्लंघन के लिए उचित कार्रवाई हो। नीचे असेंबली लाइन तक यह संदेश पहुंचाना अहम है कि सरकार ऐसे किसी लापरवाही या उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगी जो लोगों की जिंदगी खतरे में डालती हो।
