मार्गदर्शन और अमल में अंतर के कारण भीड़ से कुचलने की घटना हो सकती है

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अफसोस की बात है कि एक निजी और अपंजीकृत मंदिर में भीड़ से कुचलने की घटना ऐसे दिन हुई जब काफी लोगों के आने का अनुमान पहले से था। हालांकि इसने हैरत में नहीं डाला। रिपोर्टों से प्रवेश और निकास का एक ही साझा द्वार होने, एक निर्माणाधीन क्षेत्र के सार्वजनिक उपयोग, अपर्याप्त प्रबंधन, क्षमता से बहुत ज्यादा जुटान और कमजोर बुनियादी ढांचे का पता चलता है। जानकारी के मुताबिक, साल 2024 में हाथरस में भीड़ से कुचलने की घटना एक ऐसे आयोजन के बाद हुई जहां उपस्थित भीड़ के केवल एक-तिहाई के लिए ही इजाजत दी गयी थी और जांच में अपर्याप्त निकास द्वारों तथा योजना और निगरानी में खामियों का हवाला दिया गया। साल 2011 के सबरीमाला कांड ने भी संख्या में प्रत्याशित उछाल वाले दिन भीड़ के ‘सर्कुलेशन कंट्रोल’ में प्रणालीगत कमजोरियां और एक कारण (ट्रिगर) उजागर किया जो संकरे रास्तों के चलते जानलेवा बन गया। इन घटनाओं के अलग-अलग तात्कालिक कारण (ट्रिगर) थे, लेकिन नाकामी की वजहें समान थीं : आमने – सामने की दिशाओं में पदयात्रियों का प्रवाह एवं साझा द्वार, कमजोर भौतिक सार्वजनिक बुनियादी-ढांचा और रियल-टाइम घनत्व निगरानी का अभाव। इन नाकामियों का अनुमान लगाने के लिए निर्देश भारत में पहले से हैं, जिनमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय भवन संहिता (एनबीसी) शामिल हैं। भारतीय प्राधिकारियों ने पहले ही निर्देश से लेकर संचालन तक एक व्यवहार्य रास्ता दिखाया है, जिसमें हालिया सबरीमाला सीजन और तिरुमाला में काम कर रहा एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर शामिल है। इसमें एनडीएमए या एनबीसी के नुस्खों के अनुरूप लाइसेंस-प्राप्त योजनाएं; आकलित ऑक्युपेंसी; प्रमाणित संरचनाएं जो दोतरफा प्रवाह रोकती हैं; प्रशिक्षित व्यवस्थापकों द्वारा रियल-टाइम घनत्व नियंत्रण; और रियल टाइम संवाद और भीड़ विश्लेषण शामिल हैं। बार-बार भगदड़ होने का कारण, मार्गदर्शन और लागू कराये गये अमल में अंतर है।

भारत में होने वाली भगदड़ों का लगभग 80 फीसदी धार्मिक जुटानों या तीर्थयात्राओं में घटित होना महज संयोग नहीं है। तीर्थयात्रा और जुटान आयोजन अक्सर बिना ऐसे किसी लाइसेंस के होते हैं जिसमें अनुमति अनुपालन के लिए परखी जा सकने वाली भीड़ सुरक्षा योजना से जुड़ी होती है। प्राधिकारी अक्सर उपलब्ध जगह से क्षमता का हिसाब लगाते हैं, न कि निकास विकल्पों और भीड़ के निकलने में लगने वाले समय के आधार पर। वे खराब या बेरोक-टोक प्रवेश (नो-गेटिंग) योजनाओं को बर्दाश्त करते हैं, बिना प्रमाणित लोड रेटिंग के कामचलाऊ बैरीकेडों को स्वीकार करते हैं, और निर्माण सामग्री वाले क्षेत्रों की घेराबंदी नहीं करते। लोक सुरक्षा एक प्रक्रिया है और इसका लोप, भीड़-जनित आपदाओं के दौरान भी, शायद ही कभी एकल-बिंदु विफलताओं के चलते होता है। श्रीकाकुलम की घटना एक ज्ञात जोखिम पैटर्न के मुताबिक है और देश की अपनी संहिताओं, जिन्हें लाइसेंसिंग द्वारा लागू किया जाना चाहिए, को अनुशासित ढंग से अपनाने से ही इसे पलटा जा सकता है। भारत को एक नीति संबंधी संस्कृति भी विकसित करने की जरूरत है जो धार्मिक आयोजनों को योजना (इंजीनियर्ड) प्रणालियों के रूप में देखे जिन्हें लाइसेंसिंग और ऑडिटिंग की आवश्यकता होती है।

The Suryadon
Author: The Suryadon

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