सोनम वांगचुक को जेल में रखकर बातचीत करना वैध नहीं होगा

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जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया जाना और भाजपा तथा सरकार द्वारा उन पर की गई आरोपों की बौछार, संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र लद्दाख में हालात और बिगड़ने का संकेत है। वांगचुक लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर नागरिक समाज समूहों (सिविल सोसाइटी) की तरफ से एक आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे, जो 24 सितंबर को हिंसक हो उठा। जैसा कि सरकार और पुलिस कर रही है, हिंसा के लिए उन पर दोष मढ़ना नासमझी भरा और तथ्यों के उलट है। यह उन मुद्दों, जिनके चलते अशांति फैली है, पर गौर करने का कोई बढ़िया तरीका नहीं है। वांगचुक इस उम्मीद में 2019 में पूर्ववर्ती जम्मू एवं कश्मीर राज्य को केंद्र – शासित प्रदेशों (यूटी) में विभाजित करने के केंद्र के फैसले के समर्थक रहे हैं कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा और इसके बाद छठी अनुसूची में शामिल करके इसकी देशी संस्कृति एवं विरासत की रक्षा की जाएगी। भाजपा ने कम से कम छठी अनुसूची के सवाल पर सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्धता जताई थी। लद्दाख को केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में अलग करने के बाद के घटनाक्रमों ने एक उलट रूख अख्तियार कर लिया, जिससे वहां की मूल आबादी अलग-थलग महसूस कर रही है। केंद्र ने बातचीत शुरू की और 27 मई, 2025 को नागरिक समाज समूहों के साथ एक अस्थायी समझौता किया, जो अस्पष्ट कारणों से टूट गया। लेकिन प्रदर्शनकारियों और केंद्र के बीच अविश्वास की खाई बिल्कुल स्पष्ट है। केंद्र अब बातचीत जारी रखने की योजना बना रहा है, जबकि वांगचुक जोधपुर की जेल में बंद हैं।

सेक्मोल नाम के स्कूल, जिसके वांगचुक सह-संस्थापक थे, के खिलाफ जांच शुरू कर दी गई है। हालांकि, अब वे इसके प्रबंधन से जुड़े नहीं हैं। केंद्र ने कथित वित्तीय अनियमितताओं की वजह से उसका एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया है। वांगचुक ने सभी आरोपों का खंडन किया है और किसी भी जांच का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि यह अशांति छह साल से किए गए अधूरे वादों, जो खासकर रोजगार सृजन और संवैधानिक सुरक्षा के उपायों से जुड़े हैं, के चलते उपजी है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने वांगचुक की सक्रियता को शांतिपूर्ण और गांधीवादी बताया है। हिंसा के बावजूद, राजनीतिक स्थिति पर काबू पाने के लिए सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल राजनैतिक कौशल की कमी को दर्शाता है। हालात कुछ ऐसे हैं कि वांगचुक को हिरासत में रखने के दौरान अन्य वार्ताकारों के साथ किए गए किसी भी समझौते की दुनिया या लद्दाख के लोगों की नजर में कोई वैधता नहीं होगी। जैसा कि भाजपा के कई सहयोगी

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